✍️ डॉ. विनय कुमार वर्मा
1942 का अगस्त केवल कैलेंडर का एक महीना नहीं था, यह भारतीय स्वाधीनता संघर्ष का सबसे धधकता अध्याय था। उस वर्ष की हवा में एक अलग ही गंध थी-बारूद और बलिदान की मिली-जुली गंध। महात्मा गांधी का मुंबई से उठा “अंग्रेज़ो, भारत छोड़ो” का नारा मानो देश के हर कोने में फैल गया था। चाय की दुकानों पर चुस्की के साथ आज़ादी की बातें होतीं, खेतों के मेड़ों पर किसान हल रोककर गोष्ठी कर लेते, और गलियों में बच्चों की खेल-खेल में भी “भारत माता की जय” गूँजने लगती।
चंदौली जनपद का छोटा-सा कस्बा सकलडीहा- जहाँ की पहचान अब तक आसपास के हरे-भरे खेत, साप्ताहिक हाट और मेहनतकश लोगों से थी- उस अगस्त में अचानक इतिहास की धड़कन बन गया। यहाँ न कोई बड़ा नेता आने का सिलसिला था, न ही कोई विशाल राजनीतिक मंच, लेकिन यहाँ के दिलों में गुलामी का दर्द उतना ही गहरा था जितना किसी भी बड़े शहर में। धानापुर और सैय्यदराजा की खबरें कि तिरंगा फहराने की कोशिश में लोग शहीद हो गए, सकलडीहा के रक्त को और भी लाल कर गईं।
रात के अँधेरे में गुप्त बैठकों का सिलसिला शुरू हुआ। किसी के आँगन, किसी के खलिहान, या किसी सुनसान पगडंडी पर- तेल की ढिबरी या मोमबत्ती की टिमटिमाती लौ में क्रांति की योजना बनती। इन बैठकों में सबसे आगे थे- रामधनी सिंह, बलराम पांडे, भगवती प्रसाद गुप्त, रामआसरे यादव, गंगाराम कश्यप, जयनारायण साहू-और दर्जनों अनाम चेहरे, जिनका नाम इतिहास में भले न लिखा गया हो, पर जिनकी धड़कन उस दिन की मिट्टी में आज भी सुनाई देती है।
योजना बनी कि इस बार केवल नारा लगाने पर बात खत्म नहीं होगी। थाने पर तिरंगा फहराना है, चाहे जान चली जाए। और इसके साथ ही दूसरा निर्णय हुआ – पास की रेलवे लाइन पर हमला कर पटरियाँ उखाड़ दी जाएँगी, ताकि अंग्रेज़ सरकार की नसों में दौड़ता संचार और सैनिक आपूर्ति का रक्त रुक जाए। यह केवल भावनाओं का विस्फोट नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति थी।
सुबह 28 अगस्त 1942, हवा में एक अनजाना कंपन था। खेतों में खड़े धान के पौधे भी जैसे इस इरादे को सलामी दे रहे थे। लोग घरों से निकल रहे थे-किसी के हाथ में लाठी, किसी के पास पत्थर, और सबसे आगे रामधनी सिंह, जिनके सीने से तिरंगा ऐसे चिपका था जैसे यह उनके हृदय का हिस्सा हो। उनके पीछे बलराम पांडे, गंगाराम कश्यप, और भगवती प्रसाद गुप्त, जो अपनी बुलंद आवाज़ में बार-बार नारा लगाते-“भारत माता की जय!”-और भीड़ लहर की तरह गूँज उठती।
पहला दल रेलवे की ओर बढ़ा। उस समय रेल अंग्रेज़ी साम्राज्य की रीढ़ थी- अनाज, हथियार, फौजी, सब इन्हीं पटरियों पर दौड़ते थे। कस्बे के युवाओं ने फावड़े, कुदाल और लोहे की सलाई लेकर पटरियों पर हमला किया। कस-कि-कस, की आवाज़ के साथ लोहे के फिशप्लेट ढीले होने लगे। कोई पत्थर की गिट्टी उखाड़ रहा था, कोई पटरी के नीचे की मिट्टी खोद रहा था। लोहा गरजता था, और युवक उससे भी ऊँची आवाज़ में नारे लगाते थे- “इंकलाब ज़िंदाबाद!” कुछ ही देर में दर्जनों गज लंबी पटरी उखाड़ दी गई। यह ब्रिटिश शासन के लिए सीधी चुनौती थी- “हम तुम्हारे रास्ते रोक सकते हैं।”
उधर, दूसरा और बड़ा दल थाने की ओर बढ़ा। थाने के बाहर बंदूकधारी सिपाही तैनात थे, आँखों में नफ़रत और भीतर कहीं भय। उन्हें पता था कि यह भीड़ केवल डराने नहीं आई है, यह अपना हक़ लेने आई है।
ज्यों-ज्यों भीड़ आगे बढ़ी, नारों की गूँज हवा को चीरती हुई दीवारों से टकराई- “अंग्रेज़ो भारत छोड़ो!”, “वंदे मातरम!”, “भारत माता की जय!”
रामधनी सिंह ने तिरंगा ऊँचा किया और थाने की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। बलराम पांडे ने दरवाज़े को धक्का दिया, भगवती प्रसाद गुप्त ने झंडे का डंडा थाम लिया। और तभी- बंदूकें गरजीं। पहली गोली रामधनी सिंह के सीने में लगी। उनके होंठों से केवल एक शब्द निकला- “भारत…” और वे गिर पड़े, पर तिरंगा हाथ से छूटा नहीं। बलराम पांडे ने झंडा थामा, लेकिन दूसरी गोली ने उनकी जान ले ली। गंगाराम कश्यप के कंधे में गोली लगी, फिर भी वे पीछे नहीं हटे- लहूलुहान हाथ से झंडा थाने के ऊपर पहुँचाने की कोशिश करते रहे।
भीड़ में भगदड़ मच गई, लेकिन कुछ लोग वहीं डटे रहे। जयनारायण साहू ने पत्थर उठाकर पुलिस की ओर फेंका, रामआसरे यादव ने लाठियों से जवाब दिया। पर बंदूक की आग ने कई और जिंदगियाँ छीन लीं। ज़मीन पर पड़े शरीर अब लाशें नहीं थे- वे उस धरती में विलीन हो चुके थे जिसके लिए उन्होंने प्राण दिए। बहता रक्त सीढ़ियों से उतरकर धूल में समा रहा था- जैसे धरती अपने पुत्रों का बलिदान पी रही हो।
अंग्रेज़ अफ़सरों ने तुरंत आदेश दिया- घायल और मृतकों के शव वहीं पड़े रहें, कोई छुए नहीं। कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया- भगवती प्रसाद गुप्त और गंगाराम कश्यप भी उनमें थे- घायल, मगर बेड़ियों में जकड़े हुए।
कस्बे पर मातम छा गया, लेकिन यह मातम कायरता का नहीं, बल्कि गर्व का था। जिन माँओं ने अपने बेटे खोए, उन्होंने रोते हुए कहा- “हमने बेटा खोया है, पर देश को बेटा दिया है।”
उस दिन के बाद सकलडीहा का हर कोना बदल गया। रेलवे लाइन के पास की उखड़ी पटरियाँ कई दिनों तक वैसे ही पड़ी रहीं- जैसे किसी ने लोहा नहीं, अंग्रेज़ी साम्राज्य की हेकड़ी उखाड़ी हो। थाने की सीढ़ियों पर अब भी बारूद की गंध थी। गली-गली में लोग उस दिन की बातें करते, चौपालों में बुज़ुर्ग आँखें भरकर शहीदों के नाम लेते।
बच्चे अपने खेलों में तिरंगा फहराने की घटना दोहराते। खेतों में काम करते किसान जब धूप में पसीना बहाते, तो उन्हें लगता कि यह पसीना उन शहीदों की लाज बचा रहा है। स्कूलों में तिरंगा फहराते समय बच्चों के चेहरे पर वही चमक होती, जो 1942 के उन युवकों की आँखों में थी।
आज़ादी के बाद भी 28 अगस्त की तारीख़ आते ही कस्बा तीर्थ में बदल जाता। लोग उन स्थानों पर फूल चढ़ाते जहाँ रक्त बहा था, और अपने बच्चों से कहते- “याद रखना, यह आज़ादी यूँ ही नहीं मिली।” दुकानों, गलियों, मंदिरों और मस्जिदों के बीच यह कहानी बार-बार सुनाई जाती- कभी आँसुओं के साथ, कभी गर्व के साथ, और हमेशा इस चेतावनी के साथ कि अगर समय आए तो हमें भी उतना ही साहसी होना पड़ेगा।
सकलडीहा कांड यह सिखाता है कि बलिदान किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं, यह पूरे समाज का संकल्प है। उस दिन जिन नामों ने अपनी जान दी- रामधनी सिंह, बलराम पांडे, गंगाराम कश्यप, भगवती प्रसाद गुप्त, जयनारायण साहू, रामआसरे यादव और वे अनगिनत चेहरे जिनका नाम दर्ज नहीं हो सका- वे सब मिलकर तिरंगे में अपनी आत्मा पिरो गए, जिसे आज हम गर्व से लहराते हैं।
आज जब हम खुले आकाश के नीचे बिना डर के जीते हैं, जब हम तिरंगे के नीचे खड़े होकर राष्ट्रगान गाते हैं, तब कहीं इतिहास की परछाइयों में खड़े सकलडीहा के शहीद हमें देख रहे होते हैं। उनकी मुस्कान में वही निश्चिंतता होती है, जो उस दिन थी जब उन्होंने गोलियों के सामने सीना तान दिया था। और यह कस्बा, यह मिट्टी, आने वाली पीढ़ियों को हमेशा फुसफुसाकर कहती रहेगी-
“हम आज़ाद हैं, क्योंकि किसी ने अपनी आज़ादी से पहले हमें चुन लिया था।”
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डॉ. विनय कुमार वर्मा



